जाने आखिर क्यों मनाया जाता है मोहर्रम क्या है इसके पीछे की कहानी
बलरामपुर(रिपोर्ट- राम चरित्र वर्मा): मोहर्रम इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्यौहार है। इस माह की उनके लिए बहुत विशेषता और महत्ता है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मोहर्रम हिजरी संवत का प्रथम मास है। मोहर्रम इस्लामी साल का पहला महीना होता है। इसे हिजरी भी कहा जाता है। हिजरी सन की शुरूआत इसी महीने से होती है। इतना ही नहीं इस्लाम के चार पवित्र महीनों में इस महीने को भी शामिल किया जाता है।
अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस मास को अल्लाह का महीना कहा है। मोहर्रम के बारे में जानने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को देखना पड़ेगा, जब इस्लाम में खिलाफत यानी खलीफाओं का शासन था।
क्यों मनाते है मुहर्रम ?
दरअसल इराक में यजीद नामक जालिम बादशाह था जो इंसानियत का दुश्मन था। हजरत इमाम हुसैन ने जालिम बादशाह यजीद के विरुद्ध जंग का एलान कर दिया था।मोहम्मद-ए-मुस्तफा के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन को कर्बला नामक स्थान में परिवार व दोस्तों के साथ शहीद कर दिये गये थे। जिस महीने में हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था वह मोहर्रम का ही महीना था। उस दिन 10 तारीख थी, जिसके बाद इस्लाम धर्म के लोगों ने इस्लामी कैलेंडर का नया साल मनाना छोड़ दिया। बाद में मोहर्रम का महीना गम और दुख के महीने में बदल गया।
कौन हैं शिया मुस्लिम?
इस्लाम की तारीख में पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता यानी खलीफा चुनने का रिवाज रहा है। ऐसे में पैगंबर मोहम्मद साहब के बाद चार खलीफा चुने गए। लोग आपस में तय करके किसी योग्य व्यक्ति को प्रशासन, सुरक्षा इत्यादि के लिए खलीफा चुनते थे। जिन लोगों ने हजरत अली को अपना इमाम (धर्मगुरु) और खलीफा चुना, वे जिन्हे शिया कहलाते हैं। शिया यानी हजरत अली के समर्थक। इसके विपरीत सुन्नी वे लोग हैं, जो चारों खलीफाओं के चुनाव को सही मानते हैं।
पहनते हैं काले कपड़े
मोहर्रम माह के दौरान शिया समुदाय के लोग मोहर्रम के 10 दिन काले कपड़े पहनते हैं।वहीं अगर बात करें मुस्लिम समाज के सुन्नी समुदाय के लोगों की तो वह मोहर्रम के 10 दिन तक रोज़ा रखते हैं। इस दौरान इमाम हुसैन के साथ जो लोग कर्बला में शहीद हुए थे उन्हें याद किया जाता है और इनकी आत्मा की शांति की दुआ की जाती है।
क्या करते हैं जुलूस में?
इस दिन को लोग करबला के खूनी युद्ध पर भाषण सुनते हैं, संगीत से बचते हैं, और शादी-विवाह जैसे खुशहाल अवसरों पर नहीं जाते हैं। मुहर्रम के 10वें दिन, वो रंगीन बैनरों और बांस-और-कागज के शहीद चित्रणों के साथ सड़कों पर उतरते हैं। इस जुलूस के दौरान, वे नंगे पैर चलते हैं और विलाप करते हैं। कुछ लोग अपने आपको खून निकालने तक कोड़े भी मारते हैं जबकि कुछ लोग नाचकर करबला के युद्ध का अभिनय करते हैं।
इस्लाम के लिए शहादत
इमाम हुसैन की शहादत से बहुत पहले उनके नाना यानी पैगंबर साहब ने कहा था कि इस्लाम को बचाने के लिए तुम्हारी शहादत पूरे परिवार के साथ होगी लेकिन तुम्हारा नाम जब तक दुनिया है, तब तक कायम रहेगा। जिनका विश्वास मानवता, सहिष्णुता, अहिंसा में होगा, वे लोग तुम्हारी याद दुनिया का वजूद रहने तक मनाते रहेंगे। 680 ई. से शुरू हुआ सिलसिला आज भी जारी है। हालांकि कई देशों में इमाम हुसैन का गम मनाने की मनाही है लेकिन दुनिया में जहां-जहां सही मायने में लोकतंत्र है, वहां इमाम हुसैन का गम मनाया जाता है।
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दीपक कुमार, सुपौल
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